इंतजार रफ्तार का .....
टी-20 वर्ल्ड कप 2012 मे इंग्लैड के खिलाफ भारतीय टीम दो स्पिनर के साथ उतरी थी. फार्मूला चल निकला और इंग्लैड के खिलाफ एक बडी जीत भारत को मिली. सुपर -8 के पहले ही मैच मे भारत ने अपनी स्पिन को ताकत को बढाया और तीन स्पिनर के साथ उतरी, भारत के बल्लेबाज़ आस्ट्रेलिया की तेज़ गेंदबाजी के खिलाफ कमजोर साबित हुये और सिर्फ 140 रन ही बना पाये. इस स्कोर पर भारतीय टीम मैच जीत सकती थी. क्योंकि इस बार भारत के पास तीन स्पिनर थे. परंतु आस्ट्रेलिया के ओपनर्स ने भारतीय स्पिनर्स को कोई रियायत नही दी और ताबडतोड रन बनाकर मैच आसानी से जीत लिया.
भारतीय टीम की स्पिन गेंदबाजी हमेशा से सशक्त रही है. लेकिन तेज़ गेंदबाजी मे हमेशा भारतीय टीम का हाथ तंग रहा है. कपिल देव के बाद भारत के पास अब तक कोई उनके स्तर का तेज़ गेंदबाज़ नही आया है. जवागल श्रीनाथ, वेंकटेश प्रसाद भी अच्छे गेंद्बाज थे. जहीर खान भी अच्छी गेंद्बाजी करते है,परंतु कपिल देव के स्तर तक नही पहुच पाये है.
भारत के पास अब तक डेल स्टेन,मोर्ने मोर्कल, ब्रेट ली, फ़िडेल एड्वर्डस,वसीम अकरम,वकार यूनिस जैसे गेंद्बाज़ नही आये है. कहने को ये कह सकते है के भारतीय टीम बल्लेबाजी और स्पिन गेंद्बाजी मे हमेशा से अच्छी रही है. किसी दुसरी टीम के पास भारतीय टीम जैसे बल्लेबाज़ नही है. कई बार ये भी कहा जाता है के भारत के वातावरण और तेज़ गर्मी के कारण भी तेज़ गेंदबाज़ को मुश्किले आती है. परंतु पाकिस्तान, बंगलादेश,श्रीलंका और अब अफगानिस्तान के तेज़ गेंद्बाज “”शपूर ज़रदान” ने इस बात को काफी हद तक गलत साबित किया है.
भारत के तेज़ गेंद्बाजो के साथ फिटनेस की काफी ज्यादा समस्या है. मुनाफ पटेल जब टीम मे आये थे वो भारत के सबसे तेज़ गेंदबाज़ थे. परंतु जैसे ही चोट लगी वो काफी धीमे हो गये है. श्रीसंथ की गती अभी भी तेज़ है परंतु वो साल मे आधी बार तो चोट से परेशान रहते है.
आखिर क्या कारण है के भारत मे तेज़ गेंदबाजो की कमी है?
जब इस सवाल का जवाब ढूंढने जायेंगे तो सबसे पहले दोष भारत की सपाट विकटो को दिया जाता है. कहा जाता है भारत की विकेटो पर स्पिन गेंद्बाजो को ज्यादा फायदा पहुचाती है. परंतु अगर आप पिछले कुछ सालो का रिकार्ड देखे तो अनिल कुबंले, हरभजन सिह के अलावा कोई भी विश्व स्तर के गेंदबाज़ अब तक भारत की टीम मे नही आये है.
अमित मिश्रा, पीयूष चावला, प्रज्ञान ओझा ने बीच बीच मे उम्मीदे जरूर बंधाते है. परंतु वो उम्मीद जल्द ही एक – दो सीरीज़ मे धूमिल हो जाती है. पिछले साल मे अश्विन का प्रदर्शन काफी अच्छा रहा है.
वैसे भी गेंद्बाजी के श्रेत्र मे काफी समय से भारत के पास अच्छे गेंदबाजो का अभाव रहा है. एक वक्त पर बिशन सिह बेदी,प्रस्सन्ना और चंद्रशेखर की तिकडी कमाल किया करती थी. तो 1983 के विश्व कप मे कपिल,संधू,मोहिंदर अमरनाथ जैसे धीमे और स्विंग गेंदबाज़ थे. इन सबके जाने के बाद कभी अनिल कुम्बले,कभी हरभजन और अभी अश्विन और जहीर अकेले ही मोर्चा लडा रहे है.कभी उन्हे श्रीसंथ,ईशांत,आर.पी. सिह जैसे गेंद्बाजो का साथ मिला तो कभी पार्ट टाईम गेंदबाजो ने इनके साथ विकेट साझा करे है.
एम.आर.एफ पेस फाउंडेशन की शुरुवात भारत मे सन 1987 मे हुई थी. जहा से जवागल श्रीनाथ,वेंकटेश प्रसाद,इरफान पठान,आर.पी. सिह, मुनाफ पटेल, जहीर खान ,,ग्लेन मैग्राथ, चमिंडा वास,ब्रेट ली, जैसे गेंदबाजो ने ट्रेनिंग ली है.
ग्लेन मैग्राथ, चमिंडा वास, ब्रेट ली ने अपनी तेज गेंदबाजी से दुनिया पर राज करा है और उनके मुकाबले हमारे गेंद्बाजो का प्रदर्शन काफी फीका रहा है.
क्या एम.आर.एफ पेस फाउंडेशन मे ये नही सिखाया जाता है के आप चोट से कैसे बचे ?
अगर इस सवाल का जवाब हा है तो क्यो सबसे ज्यादा चोट हमारे गेंदबाजो को लगती है. चोट लगने के बाद उनकी लय पूरी तरह से बिगड जाती है.अब तक डेनिस लिली इस अकेडमी को चला रहे थे.पर अब मैग्राथ ने इस अकेडमी की बागडोर उनके हाथो मे सौप दी गई है.
भारत मे तेज गेंद्बाजो की कमी का एक कारण ये है एक तेज़ गेंद्बाज बनने का ज्जबा ना होना, उमेश यादव और वरूण ऐरोन जैसे गेंद्बाजो से भारत को काफी उम्मीदे है.
जिस तरह से सचिन,सौरव,द्रविड, लक्ष्मण ने अपनी बल्लेबाजी के दम पर भारतीय क्रिकेट टीम और देश का नाम रोशन किया है, जल्द ही कोई तेज़ गेंदबाज भी इसी तरह से नाम रोशन करे.
चिराग जोशी
उज्जैन(म.प्र)
खेल सम्पादक, रफ़्तार लाइव
chiragrocks31@gmail.com
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Labels: Sports



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