तू ठहर के देख जरा दो पल...
जहाँ तू है तेरी वफ़ा है तेरी जवानी भी है,
मनीष शुक्ल
उन गलियों में ज़िन्दा मेरी कहानी भी है,
तू ठहर के देख जरा दो पल वहा,
ठहरी हुई अपनी निशानी भी है,
तू किस गम में है ये बतलादे मुझे,
देख तेरे पीछे मेरी जिंदगानी भी है,
ये तेरी वफ़ा है जो ज़िन्दा हू मै,
देख तेरी ऐसी मेहेरवानी भी है,
'मनी'आज हालातो में बहुत उलझा हूँ,
क्यों संग अपने ऐसी कहानी भी है ।
मनीष शुक्ल
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